धाद उत्तराखंड के समाज संस्कृति साहित्य और पर्यावरण के क्षेत्र में गत 38 वर्षों से क्रियाशील संगठन है। उत्तराखंड की आंचलिक भाषाओं में धाद का शाब्दिक अर्थ है आवाज देना। हम अपने सभी कार्यक्रम और सामाजिक पहल के लिए समाज को धाद लगाते है और उसकी सहभागिता के साथ उन्हें पूरा करते है।  हमारा सूत्रवाक्य है एक बेहतर समाज निर्माण के लिए सामाजिक सहभागिता का आधार। 

धाद वर्तमान में उत्तराखंड में सार्वजनिक शिक्षा में एक कोना कक्षा का, पर्यवारण और पारिस्थितिकी में हरेला,उत्तराखंड हिमालय में उत्पादकता के सवाल पर हरेला गाँव और फँची,आपदा प्रभावित छात्रों की शिक्षा में पुनरुत्थान,उत्तराखंड की लोकभाषाओं के पक्ष में मातृभाषा एकांश,थिएटर के विषयों पर नाट्य मंडल,देहरादून में पेड़ों के निमित्त ट्रीज ऑफ दून जैसे विभिन्न  कार्यक्रम संचालित कर रही है।

■ शिक्षा में समाज की रचनात्मक भूमिका का कार्यक्रम -कोना कक्षा का

धाद के सार्वजनिक  शिक्षा को ऊत्तराखण्ड की शिक्षा का आधार मानती है जहां प्रदेश के सबसे अंतिम पायदान के लोग  शिक्षा ग्रहण करते है।  हमने समाज को जोड़ते हुए उसकी बेहतरी के लिए कोना कक्षा का अभियान प्रारम्भ किया है जिसमे आम समाज के लोग धाद के सहयोग से सरकारी स्कूलों में किताबों के कोने स्थापित करते है। वर्तमान में 900 से अधिक स्कूलों में यह कार्यक्रम संचालित हो रहा है जहां बच्चे देश दुनिया की श्रेष्ठ किताबो पड़ते है। अभियान में  बच्चों को उत्तराखण्ड के लोकपर्वो फूलदेई के साथ जोड़ते हुए हर वर्ष रचनात्मकता का पर्व आयोजित किया जाता है।जिसमे बच्चे लेखन ड्राईंग थिएटर आदी गतिविधियों में प्रतिभाग करते है।

■ पर्यावरण पारिस्थितिकी -हरेलावन 

धाद ने उत्तराखंड के लोकपर्वो के साथ विभिन्न सामाजिक अभियानों की नींव रखी। राज्य गठन के पश्चात उत्तराखंड के लोकपर्वों को आम समाज और शासन के एजेंडे में ले जाने के लिए हरेला,घी संग्राद,इगास, फूलदेई जैसे लोक पर्वो के साथ काम किया गया। हरेला के साथ उत्तराखंड मे जन्मे इए प्रकृति पर्व के सामाजिक आयोजन की नींव 2010 में रखी गयी और 2015 में इसको विधिवत प्रस्ताव के साथ राज्य सरकार को सौंपा गया।  हरेला को राज्य पर्व घोषित करने के पहल के साथ धाद ने इस दिशा में समाज के हर वर्ग में इसके लिए अभियान संचालित किये। 2016 से धाद हर वर्ष एक माह का हरेला आयोजन करती है। हरेला के अंतर्गत धाद ने सामूहिक सहभागिता के साथ वन विकसित करने की पहल की है। जिसके अंतर्गत स्मृतिवन मालदेवता में विकसित किया गया है साथ ही  पुष्पवन,मित्रवन और बालवन बनाने की पहल की जा रही है।

■ ट्रीज ऑफ़ दून

मौजूदा दौर में विकास की परिभाषा ने शहरों में सबसे पहले उसके पेड़ों पर असर डाला है और सड़क से लेकर विकास की तमाम योजनाओं की पहली भेंट उसके सबसे शांत सेवकों यानी पेड़ हुए हैं.उत्तराखंड की अस्थायी राजधानी देहरादून इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है जहाँ पिछले ढाई दशक में हुए जनसंख्या बदलाव और विकास कार्यों के चलते उसकी हरियाली बहुत तेजी से ख़त्म हुई है. धाद ने इस विषय पर पहल करते हुए हरेला के अध्याय के अंतर्गत ट्रीज ऑफ़ दून के साथ आम समाज के साथ अपने इर्द गिर्द के पेड़ों के प्रति संवदेनशील होना और उसके रक्षण के लिए काम करने के लिए पहल की है।     
■ हरेला गाँव 

धाद एक समृद्ध उत्तराखण्ड का सूत्र हिमालय क्षेत्र में गाँव  को उत्पादनशीलता को मानती है इसके निमित्त विभिन्न विमर्श के साथ धाद ने हरेला गाँव का कार्यक्रम प्रारम्भ किया है जिसमे हम गाँव से जुड़कर उसके उत्पादन तंत्र और अन्य सरोकारों के लिए काम करते हैं हमने पहाड़ के अन्न और उत्पादन  के लोकपर्व घी संग्रान्द और कल्यो फ़ूड फेस्टिवल के साथ इस सवाल को आम समाज से जोड़ने की पहल की है। जिसमे अन्न विपणन के लिए फंचि सहकारिता और भोजन परम्परा के पक्ष में नियमित कल्यो फ़ूड फेस्टिवल आयोजित किये जाते है।

■ आपदा प्रभावित छात्रों की शिक्षा -पुनरुत्थान

उत्तराखण्ड हिमालय निरन्तर आपदा की घटनाओं का साक्षी है। जिसके चलते जनहानि और उनके परिवारों के बच्चों की शिक्षा में प्रभाव पड़ता है। केदारनाथ आपदा के पश्चात धाद ने पुनरुत्थान नाम से आपदा प्रभावित छात्रों की शिक्षा में सहयोग की पहल की। जिसके अंतर्गत आम समाज के लोग ऐस बच्चों की शिक्षा  की जिम्मेदारी लेते है । गत नौ वर्षो में 50 लाख से अधिक का सहयोग आम समाज द्वारा बच्चों को उपलब्ध करवाया गया है। यह कार्यक्रम आज भी जारी है और 

■ मातृभाषा

धाद की सामाजिक यात्रा 1987 में गढ़वाली भाषा की पत्रिका के साथ प्रारम्भ हुई। एक दौर में जब उत्तराखण्ड की लोक भाषाओं के समक्ष उनके अस्तित्व की चुनौती थी तब धाद ने आंचलिक पत्रिका के साथ ऊत्तराखण्ड की लोकभाषाओँ के पक्ष में आंदोलन का सूत्रपात किया और विभिन्न जिलों में पहाड़ की भाषाओं के पक्ष में आयोजन के साथ समाज को आंदोलित किया। वर्तमान में धाद मातृभाषा एकांष के अंतर्गत हर वर्ष विश्व मातृभाषा दिवस का आयोजन करता है जिसमे प्रदेश की विभिन्न भाषाओं के निमित्त आयोजन किये जाते है।

■ साहित्य एकांश 

धाद विभिन्न रचनात्मक विधाओं को बेहतर समाज निर्माण का आधार मानती है इसलिए साहित्य सृजन के क्षेत्र में विभिन्न सृजनात्मक गतिविधियों के निमित्त साहित्य एकांश का गठन किया गया है जो वर्तमान में शिक्षा में समाज की रचनात्मक भूमिका के कार्यक्रम कोना कक्षा का के साथ नयी पीढ़ी को साहित्य लेखन पठन पाठन के लिए काम कर रहा है  

■ थिएटर – नाट्य मंडल 

धाद ने विभिन्न रचनात्मक विधाओं में काम करने के लिए पहल की है जिसमे नाट्य विधा के निमित्त धाद नाट्य मंडल आम समाज में सक्रिय है।